इंदौर। मध्य प्रदेश के बहुचर्चित भोजशाला विवाद मामले में अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि भोजशाला एक मंदिर है और हिंदू पक्ष को वहां पूजा करने का अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी माना कि यह स्थल परमार वंश के राजा भोज के समय संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र और देवी सरस्वती का मंदिर था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट और उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों को आधार बनाया। जज ने कहा कि पुरातत्व विज्ञान एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है और उसके आधार पर निकाले गए निष्कर्षों पर भरोसा किया जा सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले में संविधान के तहत नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों को भी ध्यान में रखा गया है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, “हम उन सभी वकीलों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने कोर्ट की सहायता की। तथ्यों, एएसआई एक्ट और पुरातात्विक साक्ष्यों का अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट होता है कि भोजशाला मंदिर स्वरूप स्थल है।”
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
- भोजशाला परिसर एक संरक्षित स्मारक है।
- यह स्थल मंदिर है।
- हिंदुओं को पूजा का अधिकार प्राप्त है।
- सरकार और एएसआई वहां संस्कृत शिक्षा की व्यवस्था विकसित करने पर विचार करें।
अदालत ने अपने फैसले में भोजशाला के ऐतिहासिक महत्व का भी उल्लेख किया। फैसले के अनुसार परमार वंश के राजा भोज के शासनकाल में यह स्थान संस्कृत अध्ययन और विद्या का प्रमुख केंद्र था, जहां देवी सरस्वती की उपासना की जाती थी।
लंबे समय से चल रहा था विवाद
धार स्थित भोजशाला को लेकर लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच विवाद चला आ रहा है। हिंदू संगठन इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर बताते रहे हैं, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद का हिस्सा मानता रहा है। मामले को लेकर कई वर्षों से अदालत में सुनवाई चल रही थी।
कोर्ट के इस फैसले के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। प्रशासन ने लोगों से शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील की है। वहीं हिंदू संगठनों ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे “ऐतिहासिक निर्णय” बताया है।
